URD 诗篇 章 143

诗篇 143

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1 ख़ुदावन्द, मेरी दू'आ सुन, 2और अपने बन्दे को 'अदालत में न ला, 3इसलिए कि दुश्मन ने मेरी जान को सताया है; 4इसी वजह से मुझ में मेरी जान निढाल है; 5मैं पिछले ज़मानों को याद करता हूँ, 6मैं अपने हाथ तेरी तरफ़ फैलाता हूँ 7ऐ ख़ुदावन्द, जल्द मुझे जवाब दे:मेरी रूह गुदाज़ हो चली! 8सुबह को मुझे अपनी शफ़क़त की ख़बर दे, 9ऐ ख़ुदावन्द, मुझे मेरे दुश्मनों से रिहाई बख्श; 10मुझे सिखा के तेरी मर्ज़ी पर चलूँ, इसलिए कि तू मेरा ख़ुदा है! 11ऐ ख़ुदावन्द, अपने नाम की ख़ातिर मुझे ज़िन्दा कर! 12अपनी शफ़क़त से मेरे दुश्मनों को काट डाल,

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