URD 诗篇 章 132

诗篇 132

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1 ख़ुदावन्द! दाऊद कि ख़ातिर उसकी सब मुसीबतों को याद कर; 2कि उसने किस तरह ख़ुदावन्द से क़सम खाई, 3“यक़ीनन मैं न अपने घर में दाख़िल हूँगा, 4और न अपनी आँखों में नींद, 5जब तक ख़ुदावन्द के लिए कोई जगह, 6देखो, हम ने उसकी ख़बर इफ़्राता में सुनी; 7हम उसके घरों में दाखि़ल होंगे, 8उठ, ऐ ख़ुदावन्द! अपनी आरामगाह में दाखि़ल हो! 9तेरे काहिन सदाक़त से मुलब्बस हों, 10अपने बन्दे दाऊद की ख़ातिर, 11ख़ुदावन्द ने सच्चाई के साथ दाऊद से क़सम खाई है; 12अगर तेरे फ़र्ज़न्द मेरे 'अहद और मेरी शहादत पर, 13क्यूँकि ख़ुदावन्द ने सिय्यून को चुना है, 14“यह हमेशा के लिए मेरी आरामगाह है; 15मैं इसके रिज़क़ में ख़ूब बरकत दूँगा; 16इसके काहिनों को भी मैं नजात से मुलव्वस करूँगा 17वहीं मैं दाऊद के लिए एक सींग निकालूँगा मैंने 18मैं उसके दुश्मनों को शर्मिन्दगी का लिबास पहनाऊँगा,

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