HIN 诗篇 章 44

诗篇 44

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1े परमेश्वर, हमने अपने कानों से सुना, 2तूने अपने हाथ से जातियों को निकाल दिया, 3क्योंकि वे न तो अपनी तलवार के 4हे परमेश्वर, तू ही हमारा महाराजा है, 5तेरे सहारे से हम अपने द्रोहियों को 6क्योंकि मैं अपने धनुष पर भरोसा न रखूँगा, 7परन्तु तू ही ने हमको द्रोहियों से बचाया है, 8हम परमेश्वर की बड़ाई (सेला) 9तो भी तूने अब हमको त्याग दिया 10तू हमको शत्रु के सामने से हटा देता है, 11तूने हमें कसाई की भेड़ों के 12तू अपनी प्रजा को सेंत-मेंत बेच डालता है, 13तू हमारे पड़ोसियों से हमारी 14तूने हमको अन्यजातियों के बीच 15दिन भर हमें तिरस्कार सहना पड़ता है, 44:15 दिन भर हमें तिरस्कार सहना पड़ता है: मेरे अपमान का बोध एवं प्रमाण सदैव मेरे साथ रहता है। 16शत्रु और बदला लेनेवालों के कारण, 17यह सब कुछ हम पर बीता तो 18हमारे मन न बहके, 19तो भी तूने हमें गीदड़ों के स्थान में पीस डाला, 20यदि हम अपने परमेश्वर का नाम भूल जाते, 21तो क्या परमेश्वर इसका विचार न करता? 22परन्तु हम दिन भर तेरे निमित्त (रोम. 8:36) 23हे प्रभु, जाग! तू क्यों सोता है? 24तू क्यों अपना मुँह छिपा लेता है? 44:24 तू क्यों अपना मुँह छिपा लेता है: तू हम से विमुख क्यों हो जाता है और सहायता से इन्कार क्यों करता है कि हम ऐसे दयनीय कष्टों में अकेले रह जाएँ। 25हमारा प्राण मिट्टी से लग गया; 26हमारी सहायता के लिये उठ खड़ा हो।

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