HIN 诗篇 章 41

诗篇 41

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1्या ही धन्य है वह, जो कंगाल की सुधि रखता है! 2यहोवा उसकी रक्षा करके उसको जीवित रखेगा, 3जब वह व्याधि के मारे शय्या पर पड़ा हो, 41:3 जब वह व्याधि के मारे शय्या पर पड़ा हो: कहने का अर्थ है कि परमेश्वर उसे रोग सहन की क्षमता देगा, या उसकी देह के दुर्बल होने के उपरान्त भी वह उसे शक्ति देगा, आन्तरिक शक्ति। 4मैंने कहा, “हे यहोवा, मुझ पर दया कर; 5मेरे शत्रु यह कहकर मेरी बुराई करते हैं 6और जब वह मुझसे मिलने को आता है, 7मेरे सब बैरी मिलकर मेरे विरुद्ध कानाफूसी करते हैं; 8वे कहते हैं कि इसे तो कोई बुरा रोग लग गया है; अब जो यह पड़ा है, तो फिर कभी उठने का नहीं। 41:8 अब जो यह पड़ा है, तो फिर कभी उठने का नहीं: अब कोई आशा नहीं, इसके फिर उठ खड़े होने की तो सम्भावना ही नहीं है। 9मेरा परम मित्र जिस पर मैं भरोसा रखता था, (2 शमू. 15:12, यूह. 13:18, प्रेरि. 1:16) 10परन्तु हे यहोवा, तू मुझ पर दया करके 11मेरा शत्रु जो मुझ पर जयवन्त नहीं हो पाता, 12और मुझे तो तू खराई से सम्भालता, 13इस्राएल का परमेश्वर यहोवा (लूका 1:68, भज. 106:48)

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