URD สุภาษิต บท 29

สุภาษิต 29

1ो बार बार तम्बीह पाकर भी गर्दनकशी करता है, 2जब सादिक़ इकबालमंद होते हैं, 3जो कोई हिकमत से उलफ़त रखता है, अपने बाप को ख़ुश करता है, 4बादशाह 'अद्ल से अपनी ममलुकत को क़याम बख़्शता है 5जो अपने पड़ोसी की ख़ुशामद करता है, 6बदकिरदार के गुनाह में फंदा है, 7सादिक़ ग़रीबों के मु'आमिले का ख़याल रखता है, 8ठठ्टेबाज़ शहर में आग लगाते हैं, 9अगर 'अक़्लमंद बेवक़ूफ़ से बहस करे, 10खू़ँरेज़ लोग कामिल आदमी से कीना रखते हैं, 11बेवक़ूफ़ अपना क़हर उगल देता है, 12अगर कोई हाकिम झूट पर कान लगाता है, 13ग़रीब और ज़बरदस्त एक दूसरे से मिलते हैं, 14जो बादशाह ईमानदारी से गरीबों की 'अदालत करता है, 15छड़ी और तम्बीह हिकमत बख़्शती हैं, 16जब शरीर कामयाब होते हैं, तो बदी ज़्यादा होती है; 17अपने बेटे की तरबियत कर; 18जहाँ रोया नहीं वहाँ लोग बेकैद हो जाते हैं, 19नौकर बातों ही से नहीं सुधरता, 20क्या तू बेताम्मुल बोलने वाले को देखता है? 21जो अपने घर के लड़के को लड़कपन से नाज़ में पालता है, 22क़हर आलूदा आदमी फ़ितना खड़ा करता है, 23आदमी का ग़ुरूर उसको पस्त करेगा, 24जो कोई चोर का शरीक होता है, अपनी जान से दुश्मनी रखता है; 25इंसान का डर फंदा है, 26हाकिम की मेहरबानी के तालिब बहुत हैं, 27सादिक़ को बेइन्साफ़ से नफ़रत है,

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