Mazmur 74
1हे परमेश्वर, तूने हमें क्यों सदा के लिये छोड़ दिया है? 2अपनी मण्डली को जिसे तूने प्राचीनकाल में मोल लिया था, 74:2 जिसे तूने प्राचीनकाल में मोल लिया था: तूने उसे अपना बनाने के लिए या अपनाने के लिए मोल लिया था उन्हें बन्धन से मुक्त करवाकर इस प्रकार उनका अधिकार अपने हाथों में रखने के लिए।(व्यव. 32:9, यिर्म. 10:16, प्रेरि. 20:28) 3अपने डग अनन्त खण्डहरों की ओर बढ़ा; 4तेरे द्रोही तेरे पवित्रस्थान के बीच गर्जते रहे हैं; 5वे उन मनुष्यों के समान थे 6और अब वे उस भवन की नक्काशी को, 7उन्होंने तेरे पवित्रस्थान को आग में झोंक दिया है, 8उन्होंने मन में कहा है, “हम इनको एकदम दबा दें।” 9हमको अब परमेश्वर के कोई अद्भुत चिन्ह दिखाई नहीं देते; 10हे परमेश्वर द्रोही कब तक नामधराई करता रहेगा? 11तू अपना दाहिना हाथ क्यों रोके रहता है? 12परमेश्वर तो प्राचीनकाल से मेरा राजा है, 13तूने तो अपनी शक्ति से समुद्र को दो भागकर दिया; तूने तो समुद्री अजगरों के सिरों को फोड़ दिया। 74:13 तूने तो समुद्री अजगरों के सिरों को फोड़ दिया: यह परमेश्वर की परमशक्ति के संदर्भ में है जब इस्राएल समुद्र से पार हो रहा था तब उसने उसका प्रदर्शन किया था। उनके मार्ग में बाधक गहरे समुद्र के सब विशाल जलचरों को उसने नष्ट कर दिया था। 14तूने तो लिव्यातान के सिरों को टुकड़े-टुकड़े करके जंगली जन्तुओं को खिला दिए। 15तूने तो सोता खोलकर जल की धारा बहाई, 16दिन तेरा है रात भी तेरी है; 17तूने तो पृथ्वी की सब सीमाओं को ठहराया; 18हे यहोवा, स्मरण कर कि शत्रु ने नामधराई की है, 19अपनी पिण्डुकी के प्राण को वन पशु के वश में न कर; 74:19 अपनी पिण्डुकी के प्राण को वन पशु के वश में न कर: यह परमेश्वर के प्रेमी जनों की प्रार्थना है कि वह उन्हें उनके शत्रुओं के हाथ में नहीं देगा। 20अपनी वाचा की सुधि ले; 21पिसे हुए जन को अपमानित होकर लौटना न पड़े; (भज. 103:6) 22हे परमेश्वर, उठ, अपना मुकद्दमा आप ही लड़; 23अपने द्रोहियों का बड़ा बोल न भूल,