시편 10
1ऐ ख़ुदावन्द तू क्यूँ दूर खड़ा रहता है? 2शरीर के गु़रूर की वजह से ग़रीब का तेज़ी से पीछा किया जाता है; 3क्यूँकि शरीर अपनी जिस्मानी ख़्वाहिश पर फ़ख़्र करता है, 4शरीर अपने तकब्बुर में कहता है कि वह पूछताछ नहीं करेगा; 5उसकी राहें हमेशा बराबर हैं, 6वह अपने दिल में कहता है, “मैं जुम्बिश नहीं खाने का; 7उसका मुँह ला'नत — ओ — दग़ा और ज़ुल्म से भरा है; 8वह देहात की घातों में बैठता है, 9वह पोशीदा मक़ाम में शेर — ए — बबर की तरह दुबक कर बैठता है; 10वह दुबकता है, वह झुक जाता है; 11वह अपने दिल में कहता है, “ख़ुदा भूल गया है, वह अपना मुँह छिपाता है; 12उठ ऐ ख़ुदावन्द! ऐ ख़ुदा अपना हाथ बुलंद कर! 13शरीर किस लिए ख़ुदा की नाक़द्री करता है 14तूने देख लिया है क्यूँकि तू शरारत और बुग्ज़ देखता है ताकि अपने हाथ से बदला दे। 15शरीर का बाज़ू तोड़ दे। 16ख़ुदावन्द हमेशा से हमेशा बादशाह है। 17ऐ ख़ुदावन्द तूने हलीमों का मुद्दा'सुन लिया है 18कि यतीम और मज़लूम का इन्साफ़ करे