Psalmi 94
1हे यहोवा, हे पलटा लेनेवाले परमेश्वर, (व्यव. 32:35) 2हे पृथ्वी के न्यायी, उठ; 3हे यहोवा, दुष्ट लोग कब तक, 4वे बकते और ढिठाई की बातें बोलते हैं, 5हे यहोवा, वे तेरी प्रजा को पीस डालते हैं, 6वे विधवा और परदेशी का घात करते, 7और कहते हैं, “यहोवा न देखेगा, 8तुम जो प्रजा में पशु सरीखे हो, विचार करो; तुम कब बुद्धिमान बनोगे? 94:8 तुम कब बुद्धिमान बनोगे: तुम्हारी यह मूर्खता कब तक रहेगी? तुम सत्य को कब स्वीकार करोगे? तुम अगर प्राणियों के सदृश्य कब व्यवहार करोगे? 9जिसने कान दिया, क्या वह आप नहीं सुनता? 10जो जाति-जाति को ताड़ना देता, और मनुष्य को ज्ञान सिखाता है, 11यहोवा मनुष्य की कल्पनाओं को तो जानता है कि वे मिथ्या हैं। (1 कुरि. 3:20) 12हे यहोवा, क्या ही धन्य है वह पुरुष जिसको तू ताड़ना देता है, 13क्योंकि तू उसको विपत्ति के दिनों में उस समय तक चैन देता रहता है, जब तक दुष्टों के लिये गड्ढा नहीं खोदा जाता। 94:13 जब तक दुष्टों के लिये गड्ढा नहीं खोदा जाता: कहने का अर्थ है कि अपने मन में अधीर न हो कि उन्हें दण्ड नहीं मिलेगा या कि परमेश्वर को चिन्ता नहीं है। 14क्योंकि यहोवा अपनी प्रजा को न तजेगा, (रोम. 11:1,2) 15परन्तु न्याय फिर धर्म के अनुसार किया जाएगा, 16कुकर्मियों के विरुद्ध मेरी ओर कौन खड़ा होगा? 17यदि यहोवा मेरा सहायक न होता, 18जब मैंने कहा, “मेरा पाँव फिसलने लगा है,” 94:18 मेरा पाँव फिसलने लगा है: मैं अब खड़ा भी नहीं हो पाता हूँ मेरी शक्ति समाप्त हो गई है, मैं कब्र में गिर रहा हूँ। 19जब मेरे मन में बहुत सी चिन्ताएँ होती हैं, (2 कुरि. 1:5) 20क्या तेरे और दुष्टों के सिंहासन के बीच संधि होगी, 21वे धर्मी का प्राण लेने को दल बाँधते हैं, 22परन्तु यहोवा मेरा गढ़, 23उसने उनका अनर्थ काम उन्हीं पर लौटाया है,